Thursday, 30 August 2012

कभी कभी मेरे दिल में भी ख्याल आता है..

ऐसा अक्सर होता है कि जाने-अनजाने कहीं बैठे-बैठे अनायास ही आपके दिमाग में  कुछ पंक्तियाँ आ जाती हैं. और अगर आपकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति अच्छी है तो आप उन चंद पंक्तियों के सहारे ही एक छोटी सी, किन्तु ठीक-ठाक कविता का सृजन कर लेते हैं.
आज मेरे साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ. कक्षा में बैठे-बैठे अनायास ही मेरे मन में कुछ पंक्तियाँ आयीं (ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है), और सौभाग्य से मेरे पास उस वक्त कलम और पन्ना भी था (बस ऐसा मेरे साथ हमेशा नहीं होता!). तो मैंने तत्काल ही उन्हें लिपिबद्ध कर लिया. और आज बहुत दिनों के बाद उन्हीं चंद पंक्तियों को मैं आपके साथ बांटना चाहूँगा. उम्मीद करता हूँ कि आपको शायद पसंद आये (हालाँकि मुझे इसमें शंका है).

ख़्वाबों के फसानों में कोई आता है कभी-कभी,
दिल में कई अनकहे अरमान जगा जाता है वो कभी-कभी.

दुनिया की खस्ताहाल दौड-धूप से हैं परेशां सभी यहाँ,
इस उबलती गर्मी में सुकून का झोंका वो लाता है कभी-कभी.

माना कि कहने को बहुत हैं अपने यहाँ पे,
उन अपनों के बीच हमें वो अपनाता है कभी-कभी.

हसरतों की चकाचौंध में उलझा खड़ा हुआ हूँ मैं,
उम्मीदों भरे उजाले की राह वो दिखाता है कभी-कभी. 

अक्सर तन्हाइयों के दौरान बेबस हो जाता हूँ मैं,
उस बियाबान तन्हाई में वो साथ देने आता है कभी-कभी.

सोचता हूँ जो लिख रहा हूँ यहाँ काश वो सब सच हो,
पर इसी झूठ के सहारे मैं मुस्कुरा पाता हूँ कभी-कभी.  

Saturday, 10 March 2012

एक छोटा सा सवाल..

कहते हैं कि कुछ सवाल ना ही पूछे जाएँ, तो ही अच्छा होता है. क्योंकि अगर सामने वाला झूठ बोल दे, तो वो आपको धोखा देगा, और अगर सच बोले, तो आपको बुरा लगेगा. इसलिए कोई भी सवाल पूछने से पहले पहले खुद से यह पूछ लेना चाहिए कि क्या हम उस सवाल के सही जवाब को सुन पाने का माद्दा रखते हैं? क्या हममें इतना साहस है, कि हम जवाब सुनकर यथार्थ का सामना कर पायें, वो भी बिना दुखी या क्रोधित हुए?

वैसे ये सब बातें तो यथार्थ जीवन में ही उपयोगी हैं. सपनों में या कल्पनाओं में तो अभिव्यक्ति सही मायनों में स्वत्रंत और बिना किसी बंदिशों के होती है. वहाँ किसी बात का डर नहीं होता, क्योंकि हमारी कल्पनाओं के रचयिता स्वयं हम ही होते हैं; और इसलिए अपनी कल्पनाओं को हम अपने अनुसार ढाल उनका सामना कर सकते हैं. और सबसे अच्छी बात, अगर हम उनका सामना ना भी कर पायें, तो हमारे पास नींद से जागने या कल्पनाओं से बाहर आने का सर्वश्रेष्ठ विकल्प तो होता ही है. 

ऐसे ही एक खयाली पुलाव में मेरे द्वारा पूछा गया इक सवाल बाद में शब्दों में उतर कुछ इस प्रकार सामने आया..

"हम उनकी तमाम बातों पे निसार थे,
और उनकी हर जवाबी रूमानी अदा को हम 
उनका प्यार समझ बैठे..

सोचा बहुत, कभी पूछेंगे उनसे
क्या वाकई जो मुझे लगता है, वो सच है?
पर ना जाने क्यूँ 
अपने दिल कर खुश कर, बिना पूछे ही
उसे उनकी मोहब्बत का इज़हार समझ बैठे..

पर जब एक दिन पूछा उनसे 
कि क्या उन्हें भी मोहब्बत है हमसे?
तो इनकार में जवाब आया, और पता चला कि 
उन्हें बस हमारे मोहब्बत की आदत सी पड़ गयी है.."