ऐसा अक्सर होता है कि जाने-अनजाने कहीं बैठे-बैठे अनायास ही आपके दिमाग में कुछ पंक्तियाँ आ जाती हैं. और अगर आपकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति अच्छी है तो आप उन चंद पंक्तियों के सहारे ही एक छोटी सी, किन्तु ठीक-ठाक कविता का सृजन कर लेते हैं.
आज मेरे साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ. कक्षा में बैठे-बैठे अनायास ही मेरे मन में कुछ पंक्तियाँ आयीं (ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है), और सौभाग्य से मेरे पास उस वक्त कलम और पन्ना भी था (बस ऐसा मेरे साथ हमेशा नहीं होता!). तो मैंने तत्काल ही उन्हें लिपिबद्ध कर लिया. और आज बहुत दिनों के बाद उन्हीं चंद पंक्तियों को मैं आपके साथ बांटना चाहूँगा. उम्मीद करता हूँ कि आपको शायद पसंद आये (हालाँकि मुझे इसमें शंका है).
आज मेरे साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ. कक्षा में बैठे-बैठे अनायास ही मेरे मन में कुछ पंक्तियाँ आयीं (ऐसा मेरे साथ अक्सर होता है), और सौभाग्य से मेरे पास उस वक्त कलम और पन्ना भी था (बस ऐसा मेरे साथ हमेशा नहीं होता!). तो मैंने तत्काल ही उन्हें लिपिबद्ध कर लिया. और आज बहुत दिनों के बाद उन्हीं चंद पंक्तियों को मैं आपके साथ बांटना चाहूँगा. उम्मीद करता हूँ कि आपको शायद पसंद आये (हालाँकि मुझे इसमें शंका है).
ख़्वाबों के फसानों में कोई आता है कभी-कभी,
दिल में कई अनकहे अरमान जगा जाता है वो कभी-कभी.
दुनिया की खस्ताहाल दौड-धूप से हैं परेशां सभी यहाँ,
इस उबलती गर्मी में सुकून का झोंका वो लाता है कभी-कभी.
माना कि कहने को बहुत हैं अपने यहाँ पे,
उन अपनों के बीच हमें वो अपनाता है कभी-कभी.
हसरतों की चकाचौंध में उलझा खड़ा हुआ हूँ मैं,
उम्मीदों भरे उजाले की राह वो दिखाता है कभी-कभी.
अक्सर तन्हाइयों के दौरान बेबस हो जाता हूँ मैं,
उस बियाबान तन्हाई में वो साथ देने आता है कभी-कभी.
सोचता हूँ जो लिख रहा हूँ यहाँ काश वो सब सच हो,
पर इसी झूठ के सहारे मैं मुस्कुरा पाता हूँ कभी-कभी.